लोकतंत्र में है मजबूत विपक्ष की आवश्यकता

 28 दिसम्बर कांग्रेस स्थापना दिवस पर विशेष

डाॅ. सत्यनारायण सिंह आई.ए.एस.(आर.)


स्वतंत्रता सेनानियों, देशभक्तों की कुर्बानियों व अथक प्रयासों से देश को स्वतंत्रता मिली और संसदीय लोकतंत्र की स्थापना हुई। लोकतंत्र व राष्ट्रीय एकता के लिए देश में 2 अथवा 3 ऐसे राष्ट्रीय दलों का होना जरूरी है जिनका आधारा पूरे देश में हो। आज हमारे देश में 2 प्रमुख राजनैतिक दल भाजपा व कांग्रेस है। भाजपा विस्तार कर रही है। भाजपा पूर्ण प्रभुत्व की लालसा में किसी भी हद तक जाकर समझौता कर रही है। कर्नाटक, मध्यप्रदेश, अब राजस्थान, असम, अरूणाचल, मणीपुर, गोवा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश में भाजपा ने पूर्व कांग्रेस नेताओं में जो वर्षो लम्बे समय तक कांग्रेस के प्रभावशाली नेता रहे है, शामिल कर सत्ता प्राप्त की है। नैतिक व्यवहार, वैचारिक सामन्जस्य छोड़कर अनैतिक तरीके अपनाकर विरोधी को तबाह करना चाहती है। संवैधानिक संस्थाओं व सरकारी ऐजेंसियों का इस्तैमाल कर पैसा व पद के बदले दल-बदल कराया जा रहा है। भाजपा की अनैतिक प्रवृति का खुलासा हो रहा है। वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों व हालात में भी यह ध्यान देने योग्य बात है कि कांग्रेस राष्ट्रीयस्तर पर सिर्फ मुख्य विपक्षी दल ही नहीं बल्कि देश की मुख्य राजनीतिक पार्टी भी है।
कांग्रेस को आज सचेत रहना होगा वह कांग्रेस राजस्थान में जीती हुई बाजी ना हार जायें। इस बात को यदि गंभीरता से नहीं लिया गया तो इसके विपरीत परिणाम आ सकते है। जनता इस समय अशोक गहलोत जैसे धीर गम्भीर व्यक्तित्व के धनी 40 साल के राजनीतिक अनुभव पर भरोसा करती है। एक सेवाभावी समर्पित जन नेता के सफर में उन्हें कई अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पड़ा है और वे हर बार कुन्दन की तरह खरा सिद्ध हुए है। भाजपा अगर आज राजस्थान में डरती है तो वह केवल एक शख्स अशोक गहलोत ही है। उन्होंने जमकर लोहा लिया है। पूरे राजस्थान व छत्तीस कोमों में पकड़ रखने वाले गहलोत केा जनता मुख्यमंत्री देखना चाहती है। उन्हें मुख्यमंत्री को देखने की मंशा से ही जनता ने राजस्थान में कांग्रेस को विजयी बनाया।
कांग्रेस को सबसे पहले अपनी राजनीतिक प्रमुखता के अनुसार अपनी रणनीति बनानी होगी केवल भाजपा द्वारा उठाये गयें मुद्धों का जवाब देने मात्र से कांग्रेस अपना ऐजेन्डा आगे नहीं ला सकेगी। इसलिए कांग्रेस को विकास व राजनीतिक गठबंधन को पहली प्राथमिकता देनी होगी। वर्तमान में जो छोटे व क्षेत्रीय पहल न्यूनतम कार्यक्रमों पर साथ आने को तैयार है। उनसे समझौता करना जरूरी है। यदि राजनीतिक अहंकार असली कद और जनाधार से ज्यादा ऊंचा होगा तो निरन्तर हानि व पराभव को कोई रोक नहीं सकेगा। कांग्रेस के पास 1991 के बाद पृथक कोई सैद्धांतिक पृथक एजेण्डा नहीं रहा।
पांचो बडे़ राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, बंगाल, बिहार में मोर्चा बनाने के अलावा कांग्रेस के पास आज कोई विकल्प नहीं है, राष्ट्रीय एकता की रक्षा, सम्प्रदायवाद का विरोध, आर्थिक-सामाजिक विकास, विश्व में भारत को प्रतिष्ठित करने, आतंकवाद व हिंसा का ताकतवर विरोध को राष्ट्रीय गठबंधन का आधार बनाया जा सकता है। भाजपा द्वारा उठाये गये मुद्धों धर्म निरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता के मुद्धे से ही काम नहीं चलेगा। दलितो, आदिवासियों, महिलाओं का सशक्तिकरण व विकास के मुद्धे को भी प्राथमिक रूप से उठाया जाना आवश्यक है।
कांग्रेस को प्रान्तीय और स्थानीय स्तरों पर सक्षम एवं प्रभावशाली नेतृत्व को जो अपने प्रदेश के मजबूत राजनेता है उनको उभारना होगा। अनुशासनहीनता केा बरदाश्त नहीं करना होगा। भाजपा के उग्र हिन्दुत्व से कांगे्रस अकेले नहीं लड़ सकती। इस मुद्धे का रोटी, कपड़ा और शिक्षा व बेरोजगारी के मुद्धे पर लड़ना होगा। आज कांगे्रस की जरूरत देश के समक्ष उपस्थित बुनियादी समस्याओं के खिलाफ लड़ने की है उग्र हिन्दुत्व का मुकाबला नरम हिन्दुत्व से करने के लिए सभी पार्टीयों के सहयोग की आवश्यकता होगी। भाजपा की कुत्सिक राजनीति से लड़ने मं सबसे बड़ी बाद्या विपक्षी नेताओं का अहम और वोट बैंक की राजनीति है। भाजपा के पत्तों से ही कांग्रेस भाजपा को नहीं हरा सकती क्योंकि कांग्रेस कुछ भी करले पर वे भाजपा से ज्यादा भाजपाई नहीं हो सकते। कांगे्रस भाजपा को मात देना चाहती है तो उसे स्पष्ट दृष्टिकोण जनता के सामने रखना होगा।
कांग्रेस का हर नेता सत्ता व संगठन मे अपना स्थान सुरक्षित करने की सांठ-गांठ में लगा है। कांग्रेस में सब समान नेता हुआ करते थे, सबके अपने व्यक्तित्व थे, उन्हीं मे से उनका सर्वमान्य नेता हुआ करता था परन्तु आज स्थिति भिन्न है। आत्मविश्वास की कमी के कारण व नेतृत्व की अनुभवहीनता के कारण सामाजिक जिम्मेदारी व हिस्सेदारी दिखाई नहीं देती। व्यक्तित्वहीनता के कारण किसी भी क्षेत्र या प्रदेश के जन संघर्ष में कांग्रेस नेता शामिल नहीं होते। दुर्भाग्यवश भाजपा के निंरतर कुप्रचार से मोदी के मुकाबले राहुल गांधी की राजनीतिक छवि नहीं बन पाई। नेतृत्व की समस्या को तुरन्त हल करना चाहिए और उसे राजनीतिक जिम्मेदारी देनी चाहिए। कांग्रेस इस दिशा में शीघ्र नहीं सोचेगी तो उसकी राजनैतिक कठिनाईयां कम नहीं होगी, बीजेपी सभी हथकन्डे अपनायेगी। भाजपा सर्वण सामन्तों, प्रतीक्षारत व सरमायेदारो, सत्ता लोलूप-चादूकार नौकरशाहों मध्यवर्ती व्यापारियों, पंक्तिबद्ध भविष्यहीन नौजवानों की पार्टी हैं। क्षेत्रीय पार्टियां, वामपंथी पार्टिया, जातिय पार्टिया है। अपने स्वार्थी से ऊपर उठकर राष्ट्रीय विकास व न्याय के सवालों में हस्तक्षेप करने इच्छा और साहस नहीं रखती।
भाजपा सरकार ने राष्ट्रीयकृत बैंको को निजीकरण के लिए खोल दिया, इसे भी कांगे्रस व तथाकथित प्रगतिशील पार्टियों ने निजीकरण के सवाल को नजरन्दाज कर दिया। संविधान से समाजवाद व धर्म निरपेक्षता को हटाने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया गया है। रेवले को प्राईवेट कंपनियों को देने की शुरूआत हो गई है। मंदी, महगांई, बेरोजगारी महामारी से जनता त्राही-त्राही कर रही है। रूपये का अवमूल्यन हो गया हैं। पैट्रोल-डीजल की कीमतें आकाश छू रही हैं। उत्पादन, निर्यात गिर चुका है। कांग्रेस सहित सभी पार्टिया मौन है। कोई सैद्धातिंक ऐजेन्डा नहीं है।  
भाजपा धर्म निरपेक्षता एवं लोक कल्याणकारी नीतियों के स्थान पर विघटनकारी धर्मान्द तत्वों की गतिविधियों केा पसन्द करती है। कांन्ग्रेस के बड़े नेताओं के सामूहिक रूप से आक्रामक रवैया नहीं अपनाया, वैतनिक-अवैतनिक प्रचारकों व कार्यकर्ताओं को नियोजित नहीं किया। दुस्प्रचार का पूरी तरह मुकाबला नहीं किया। प्रचार साधनों व मीडिया केा साथ नहीं लिया। मजबूती से सशक्त विपक्ष के रूप में सड़क से सदन तक सरकार की नीतियों की समीक्षा जोरदार तरीके से नहीं की। पार्टी में आमूलचूल बदलाव कर जमीनी मजबूत नेतृत्व से ही पार्टी उठ खड़ी हो सकती है। कांग्रेस की अनुशासन की परम्परा खत्म हो चुकी है। आलाकमान केा खुले आम चुनौती दी जाने लगी है। इसका सीधा व स्पष्ट संदेश जाना है कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व कमजोर और शक्तिहीन हो रहा है। जो नेता विवादित हो गये है उन्हें महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।
कांग्रेस संगठन को केवल भाजपा विरोधी चल रही अंतरघात पर ही निर्भर नहीं रहकर अपने आदर्श, सिद्धान्त व चिन्तन को जन-जन तक पहंुचाना चाहिए कि आज भी कांग्रेस ही एकमात्र ऐसा दल है, जो देश, समाज व जनता की सेवा कर सकता हैं व विकास के आयाम स्थापित कर सकता है। महत्वाकांक्षी तत्व अपनी शर्तो पर नेतृत्व पर फैसले लेने पर मजबूर कर रहे है अथवा नया ठिकाना तलाश रहे है। एकनिष्ठ भक्ति का युग कांगे्रस मे खत्म हो गया है, इसलिए पार्टी से बाहर जाने वालो की तादाद निकट भविष्य में बढ़ने वाली है। कांगे्रस को अतीत में जीना छोड़कर वर्तमान में जीने की तैयारी करनी होगी।
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