जनप्रतिनिधि लोकतंत्र में आई विकृतियों को दूर करें : डॉ कुसुम


बैस्ट रिपोर्टर न्यूज,जयपुर । मुक्त मंच की 77वीं संगोष्ठी “विकसित भारत और जन आकांक्षाएं “ विषय पर  परम विदुषी डॉक्टर पुष्पलता गर्ग के सान्निध्य  में भाषाविद और चिंतक डॉ.नरेन्द्र शर्मा कुसुम की अध्यक्षता में संपन्न हुई। आईएस (रि) अरुण ओझा मुख्य अतिथि थे। शब्द संसार के अध्यक्ष श्री श्रीकृष्ण शर्मा ने संयोजन किया। संगोष्ठी के अध्यक्ष डॉ. कुसुम ने कहा कि संसाधनों के संतुलित समन्वय से भौतिक विकास तो संभव है किंतु जनभावनाओं और सामाजिक सरोकारों का विमर्श इकतरफा रह जाता है। ऐसे में हमारे जनप्रतिनिधियों को जन आकांक्षाओं के अनुरूप आमजन को सुखी, समृद्ध और खुशहाल बनाने के प्रयास करने चाहिए। ऐसा नहीं हो कि अपनी आकांक्षाओं को थोप कर इतिश्री कर ली जाए। जनप्रतिनिधियों का दायित्व बनता है कि वे आमजन के साथ होने वाली दुश्वारियां, दुविधाओं और परेशानियों की समीक्षा करते रहें। हमारे लोकतंत्र में विकृतियों को दूर करना भी जनप्रतिनिधियों का दायित्व  है।

मुख्य अतिथि अरुण ओझा आईएएस (रि) ने कहा कि कि देश में विकास अमीरों के लिए समर्पित है जबकि सस्टेनेबल विकास होना चाहिए ।विकास का मॉडल तो गांधियन मॉडल ही हो सकता है ताकि गावों से लोगों का पलायन ना हो। आईएएस (रि)आरसी जैन ने कहा कि विकसित भारत  की अवधारणा और संकल्पना का कोई ब्लूप्रिंट अभी तक सामने नहीं आया है। हर कोई अपनी तरह से विकास को परिभाषित कर रहा है ।आजादी के पूर्व से अब तक तुलना करें तो विकास तो अवश्य हुआ है लेकिन विषमताएं भी बढ़ी हैं । वस्तुतः इसके निराकरण के लिए संविधान में परिकल्पना की गई थी।

प्रबुद्ध विचारक जीके श्रीवास्तव ने कहा कि विकास एक स्वतंत्र प्रक्रिया है लेकिन शासन यह देखे कि बढ़ती जनसंख्या एसेट साबित हो और संसाधनों पर बोझ नहीं बने। बढ़ती जा रही बेरोजगारी विकास की प्रक्रिया में चुनौती बनती जा रही है। इसका समाधान आवश्यक है । डॉ. सुभाष चंद्र गुप्ता का कहना था कि हमारा देश हंगर इंडेक्स और कुपोषण के मामले में निचले स्तर पर है। 

विकसित भारत के लिए नौकरशाहों  को अपनी कार्यशैली  बदलने की जरूरत है ।प्रोफेसर राजेंद्र गर्ग ने कहा कि विकास की प्रक्रिया अंतरविरोधों से ग्रस्त है। कॉरपोरेट्स की आय उत्तरोत्तर बढ़ रही है जिनके पास कुल आबादी की 41þ संपदा है और शेष आबादी के पास मात्र तीन प्रतिशत संपत्ति है। संविधान सम्मत समानता से ही देश विकसित होगा। डॉ.पुष्पलता गर्ग ने कहा कि भौतिकता की दौड़ में मनुष्यता कहीं खोती चली जा रही है। 

वरिष्ठ व्यंग्यकार कवि फारूक आफरीदी ने कहा कि विकसित भारत के लिए जरूरी है कि सर्वधर्म समभाव की भावना बनी रहे,वंचितों को उनका हक मिले, प्रशासन संवेदनशील, पारदर्शी और जवाबदेह बने और सभी लोगों के अधिकारों की रक्षा हो।

वरिष्ठ आईएएस (रि)ए आर पठान ने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था अव्यवस्थित है। विकास की दौड़ में हमने पोलियो, चेचक, नारु जैसे रोगों से मुक्ति पा ली है लेकिन कुपोषण, मोटापा और मधुमेह से अभी भी जूझ रहे हैं। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य के बल पर ही हम विकसित राष्ट्र बन सकते हैं। वरिष्ठ अभियंता दामोदर चिरानिया ने कहा कि विकसित देश वे होते हैं जहां वैज्ञानिक, तकनीकी और प्राविधिक उन्नति एवं प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो। प्रति व्यक्ति आय उत्तरोत्तर गतिशील हो। युवा चिंतक लोकेश शर्मा ने कहा कि आर्थिक असमानता की खाई को पाटना होगा। धार्मिक ध्रुवीकरण और कट्टरता से लोकतंत्र को धक्का पहुंचा है। बैस्ट रिपोर्टर के प्रमुख संपादक अनिल यादव ने कहा कि विकास टिकाऊ और गतिशील होना चाहिए। जन भावनाओं की अनदेखी नहीं की जाए । गोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार यशवंत कोठारी और कवि कल्याण सिंह शेखावत ने कहा कि शासन को स्वच्छ और भ्रष्टाचार रहित होने के साथ चुस्त और दुरुस्त होना चाहिए। कला ,साहित्य और संस्कृति के समुन्नयन के सार्थक प्रयास होने चाहिए । आईएस (रि)विष्णु लाल शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया।