इलेक्टोरल बाॅण्ड : सुदृढ संसदीय लोकतंत्र के लिए अभिशाप .... !!


भारत विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र है। लोकतंत्र का आधार स्तम्भ जागरूक मतदाता, पारदर्शी व सुदृढ चुनाव प्रणाली होती है। एक मजबूत लोकतंत्र के लिए चुनाव प्रणाली मे निरन्तर व सतत सुधार भी अति महत्वपूर्ण होते है। जिस प्रकार एक सफल व सुदृढ लोकतंत्र मे संवैधानिक संस्थाओ का सुदृढ व मजबूत होना व मतदाता का जागरूक होना महत्वपूर्ण होता है, उसी प्रकार, उस देश की राजनीतिक पार्टियों का नैतिक व वित्तीय रूप से मजबूत व पारदर्शी होना भी बहुत ही महत्वपूर्ण है। किसी भी संस्थान, चाहे वो व्यापारिक  हो या धार्मिक या अन्य कोई, के सफल संचालन के लिए प्रयाप्त पुंजी व आय आवश्यक होती है उसी प्रकार प्रत्येक राजनीतिक दल की मजबूती के लि‍ए भी प्रयाप्त  आय का होना भी बहुत ही जरूरी है।

 किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए वित्त(धन) या आय का मुख्य स्रोत व्यक्तियों, संस्थाओं व कम्पनियों से मिलने वाला स्वैच्छिक चन्दा(अंशदान) ही होता है।

जहां तक हमारे देश की बात करे तो राजनीतिक पार्टियां, देश के नागरिकों से या संस्थाओ से या सरकारी कम्पनियों को छोडकर अन्य कम्पनियों से, जो 3 वर्ष या अधिक समय से स्थापित व संचालित है से, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के प्रावधानो के अधीन स्वैच्छिक अंशदान ( चन्दा ) ले सकती है।

2018 से पूर्व तक स्वैच्छिक अंशदान या तो नकद मे या बैंकिंग माध्यम से ही लिया जा सकता था। लेकिन 2018 के बाद 'इलेक्टोरल या चुनावी बाण्डस्' के माध्यम से भी राजनीतिक चन्दा दिया जाने लगा है।

2018 मे इलेक्टोरल बाॅण्ड योजना को अधिसूचित करने से पहले, केन्द्र सरकार ने राजनीतिक पार्टियों द्वारा लिए जाने वाले स्वैच्छिक अंशदान मे पारदर्शिता के साथ ही राजनीतिक सुचिता के नाम पर, वित्त विधेयक 2017 मे 4 महत्वपूर्ण बदलाव किये गये : 

पहला आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13ए जो प्रत्येक राजनीतिक पार्टी द्वारा 20000/- रूपये से अधिक प्राप्त किये जाने वाले प्रत्येक अंशदान की विवरणी क्षेत्राधिकार वाले आयकर अधिकारी को देनी होती है, लेकिन नये बदलाव द्वारा 'इलेक्टोरल बाॅण्ड' से मिलने वाली प्रत्येक स्वैच्छिक चन्दे की राशी को, सुचना देने की अनिवार्यता से बाहर रखे जाने का प्रावधान जोडा गया अर्थात इलेक्टोरल बाॅण्ड से प्राप्त होने वाले स्वैच्छिक अंशदान का विवरण आयकर विभाग को नहीं देना होगा, जो पारदर्शिता के नाम पर आयकर विभाग जैसी संवैधानिक संस्थाओ को दन्तविहीन किये जाने का पहला बडा बदलाव था। यानी की इस छोटे बदलाव से भविष्य मे मिलने करोडो-अरबो रूपयो के राजनीतिक चन्दा देने वाले पूंजीपतियों के नामो को सार्वजनिक होने से रोके जाने के टूल के रूप किया जा रहा है। विशेषज्ञो का मानना है कि धारा 13ए के बदलाव द्वारा भ्रष्टाचार की नई इबारत लिखी जा चुकी है। वहीं नकद में लिए जाने वाले प्रत्येक चन्दे की राशी की सीमा को घटाकर सिर्फ 2000/- रूपये कर दिया गया।

दुसरा बदलाव भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 की धारा 31 मे नई उपधारा (3) जोडी गई, जिसके अनुसार ,केन्द्र सरकार को अधिकार दिया गया कि, किसी भी 'शिड्यूल बैंक' को 'इलेक्टोरल बाॅण्ड' जारी करने के लिए अधिकृत कर सकती है। 

तीसरा महत्वपूर्ण बदलाव लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29सी, जो निर्वाचन आयोग के अधीन पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों के प्राधिकृत अधिकारियों द्वारा 20000/- रूपये से अधिक के प्रत्येक स्वैच्छिक अंशदान की सुचना से सम्बंधित है, के प्रावधान से 'इलेक्टोरल बाॅण्ड' द्वारा प्राप्त अंशदान को बाहर रखने के लिए, नया प्रोविजो जोडा गया है। यानि कि 'इलेक्टोरल बाॅण्ड' से सम्बंधित अंशदान का कोई विवरण न तो सम्बंधित आयकर अधिकारी को देना है व न ही निर्वाचन आयोग को।

यानी की महत्वपूर्ण बदलावो एक आयकर अधिनियम में व दुसरा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, के द्वारा सुचनाओ व तथ्यो की पारदर्शिता तो खत्म हुई ही, साथ ही इन संवैधानिक संस्थाओ को एक तरह से चुनाव प्रणाली मे पारदर्शिता के नाम पर पंगू बनाया जा चुका है।

 चौथा व अति महत्वपूर्ण बदलाव कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 182, जो 'राजनीतिक अंशदान को निषेध व प्रतिबंधित' करने से सम्बंधित है, मे किया गया था। कम्पनी अधिनियम की धारा 182(1) का प्रोविजो, जो भारतीय कम्पनियों द्वारा किये जाने वाले अंशदान को कम्पनी के विगत तीन वर्ष के औसत लाभों का 7•5% तक सीमित करता था, को विलोपित कर दिया गया अर्थात इस विलोपन के पश्चात 2017 के नये प्रावधानों के अनुसार, कोई भी कम्पनी कितनी भी राशी का राजनीतिक अंशदान कर सकती है, चाहे वो भारी भरकम घाटे मे ही क्यों नहीं चल रही हो यहां तक की दिवालिया होने की कगार पर ही क्यों न हो। कम्पनी अधिनियम की इसी धारा मे दुसरा सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उपधारा (3) मे किया गया, जिसके अनुसार अब राजनीतिक अंशदान देने वाली कम्पनी को सिर्फ "स्वैच्छिक राजनीतिक अंशदान" की कुल राशी का सिर्फ उल्लेख खर्च के रूप मे लाभ हानि खाते मे करना है, न कि 2017 से पूर्व की स्थिति की तरह प्रत्येक अंशदान का विवरण राजनीतिक पार्टी के नाम सहित करना होगा अर्थात अब 2017 के बदलाव के बाद न तो कम्पनी के अंशधारक व न ही अन्य सम्बन्धित हितधारक व न ही आम जनता यह जान पायेगी की किस राजनीतिक पार्टी को कितना-2 चन्दा अमुख कम्पनी द्वारा दिया गया है यानी की पारदर्शिता के नाम पर ही पारदर्शिता का गला घोटा जाना शुरू हो गया।

इसी तरह वित्त विधेयक 2016 के मे किये गये महत्वपूर्ण बदलाव द्वारा "एफसीआरए 2010" की धारा 2(1)(जे)(वीआई) जो 'फोरेन सोर्स' को परिभाषित करती है, मे एक प्रोविजो, जो विगत तिथि 26-9-2010 से प्रभावी होगा, जो एक सन्देह पैदा करता है, का समावेश किया था, जिसके अनुसार, यदि कोई विदेशी संस्थान या व्यक्ति अकेले या संयुक्त रूप से यदि किसी कम्पनी मे 50% से अधिक के अंशधारक नहीं है, तो उसको 'फोरेन सोर्स' नहीं माना जायेगा अर्थात यदि कोई विदेशी कम्पनी या नागरिक किसी भारतीय गैर सरकारी कम्पनी मे 50% हिस्से के अंशधारक है, तो ऐसी कम्पनी 'फाॅरेन सोर्स' की श्रेणी मे नहीं मानी जायेगी यानी की पिछली तारीख से बदलाव के कारण जो पहले अपात्र थी वो भी पात्र हो गई है, आओ, किसी पुरानी कम्पनी के अंशधारक बनो व चन्दा दो ।

यानी की कुल मिलाकर इन उपरोक्त बदलावों द्वारा संवैधानिक संस्थाओ को तो कमजोर किया ही गया है, साथ ही आम जनता व देश के नागरिको को सामान्य प्रकिया के अधीन मिलने वाली सुचनाओं को भी छुपाये जाने का रास्ता साफ हो गया।

एक और महत्वपूर्ण बात है कि जितने भी यह सुधारात्मक कदम केंद्र सरकार ने, विगत वर्षो मे उठायें हैं, चाहे वो राजनीतिक अंशदान मे पारदर्शिता से सम्बंधित हो या अन्य महत्वपूर्ण सुधार या मास्टर स्ट्रोकस्, अधिकांश सुधारवादी कानून 'फाइनेंशियल बिल' यानी संसद के दोनो सदनो में विस्तृत विचार-विमर्श कर के पारित करवाये जाने की बजाय  'मनी बिल' की द्वारा निचले सदन यानी की सिर्फ लोकसभा मे विचार-विमर्श तक ही सीमित रखे गये है, यानी की बहुमत के जोर पर अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थो को साधने के लिए देश पर थोपे गये है, जो एक साफ सुथरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बडा प्रश्नचिह्न है।

यहां यह भी उल्लेख करना महत्वपूर्ण होगा कि 'इलेक्टोरल बाॅण्ड' एक प्रोमिजरी नोट की तरह है, जिसको भारतीय स्टेट बैंक की अधिसूचित शाखाओं द्वारा, केवाईसी नियमों की पालना के अधीन जारी किया जाता है अर्थात उसमे खरीदने वाले के साथ ही किसके पक्ष मे अमुक इलेक्टोरल बाॅण्ड जारी किया गया कि किसी प्रकार की कोई भी जानकारी उस पर अंकित नहीं होती है।  जिस भी राजनीतिक पार्टी को यह बाॅण्ड प्राप्त होता है, वो राजनीतिक पार्टी जारी किये जाने की तिथि से 15 दिन के दरमियान ही, भुगतान प्राप्त करने का अधिकार रखती है, तदुपरांत ये समयातीत मान लिये जाते है व वैधता खत्म हो जाती है । यह भी कि 'इलेक्टोरल बाॅण्ड' के माध्यम से स्वैच्छिक अंशदान सिर्फ, लोकसभा या राज्य विधानसभा चुनाव मे 1% से अधिक मत प्राप्त करने वाले राजनीतिक दल ही, प्राप्त करने के पात्र हैं।

जहां तक नकद लेनदेन को हतोत्साहित करने की बात है, इलेक्टोरल बाॅण्ड, राजनीतिक अंशदान प्राप्त करने का बहुत ही वैज्ञानिक व पारदर्शी माध्यम प्रतीत होता है, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन जिस प्रकार विभिन्न कानूनो के तहत, विभिन्न नियामकिय प्राधिकारियों को प्रस्तुत की जाने वाली सुचनाओं मे 'इलेक्टोरल बाॅण्ड' से सम्बंधित विवरण देने की अनिवार्यता से बाहर रखा गया है शामिल नहीं किया जा रहा है, जिस प्रकार केन्द्रीय सुचना आयोग, इलेक्टरल बाॅण्डस से मिलने वाली चन्दे की राशी की सुचना को सार्वजनिक हित मे नहीं मानता है, जिस प्रकार एफसीआरए 2010 मे किये गये संसोधन को पिछली तारीख से अर्थात 2010 से प्रभावी किया गया है व जिस प्रकार हर महत्वपूर्ण बदलाव सिर्फ 'मनी बिल' की तरह पारित किये गये हैं,  के कारण कई आशंकाये व विवाद उत्पन्न हो रहे हैं।

 इलेक्टोरल बाॅण्ड जारी करनी की प्रक्रिया व वैधानिकता दोनो को न्यायालयों मे चुनौती दी गई है व "एसोसिएशन फोर डेमोक्रेटिक रिफ्रोम" ने तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय को यहां तक अपने तर्क मे कहा कि, 'आरबीआई व निर्वाचन आयोग का इलेक्टोरल बाॅण्ड स्कीम के सम्बन्ध मे असहमति व वैधानिकता को लेकर कई बार पत्र व्यवहार हुये है व यह भी बताया की यह लोकतंत्र को कमजोर करने की कवायद मात्र है। 

यह भी आरोप लग रहे हैं कि इलेक्टोरल बाॅण्ड द्वारा मनीलाॅडरिंग को  बढावा मिल रहा है व सत्ता के दुरूपयोग, पारद्शिता के नाम पर लगातार बढ रहा है ।

ऐसे में, क्या इतना महत्वपूर्ण सुधार बिना सार्वजनिक विचार-विमर्श, जनता व विशेषज्ञो के सुझावों के, संसद के दोनो सदनो मे प्रयाप्त डिस्कशन के, आनन फानन मे लागू किया जाना, क्या वास्तव मे ही लोकतंत्र व लोकतांत्रिक मूल्यो को मजबूत बना पायेगा,  सार्वजनिक जीवन मे पारदर्शिता ला पायेगा या यह कवायद देश मे विद्यमान संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली को कमजोर तो नही कर रही है व सुचनाओ व जानकारियों को छुपाये जाने का टूल तो नहीं बन रहा है??

क्या इलेक्टोरल बाॅण्ड चुनावी पारदर्शिता लाने मे सक्षम हो पायेगे, उस स्थिति मे जब उसकी पारदर्शिता व वैधानिकता विवादो मे हैं व सम्बंधित संवैधानिक संस्थाऐ,देशहित मे इस प्रकार की किसी योजना के क्रियान्वयन के पक्ष मे न हो?

केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि इलेक्टोरल बाॅण्ड की खरीद बिक्री पर चुकाया जाने वाला कमीशन, कर संग्रहण की राशी मे से होगा। इस प्रकार सिर्फ व सिर्फ पारदर्शिता के नाम पर सुचनाओ को सार्वजनिक नहीं करके, देश को गुमराह किया जा रहा है व अंधेरे मे रखा जा रहा है, तो ऐसे मे इलेक्टोरल बाॅण्ड मजबूत लोकतंत्र के लिए वरदान की बजाय अभिशाप तो नहीं साबित नहीं हो रहा है?

सबसे बडा सवाल की क्या देश की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि किस व्यक्ति, संस्थान या कम्पनी ने कितनी राशी के इलेक्टोरल बाॅण्ड खरीदे व किस-2 राजनीतिक पार्टी को किस किस व्यक्ति, संस्थान या कम्पनी से कुल कितना चन्दा प्राप्त हुआ?

अन्त मे कि जैसा कि संविधान व कानून के जानकार देश को आगाह कर रहें है कि, इलेक्टोरल बाॅण्ड, लोकतंत्र के लिए बडा खतरे के साथ ही कार्पोरेट व संस्थागत भ्रष्टाचार व घोटालो का एक नया तरीका मात्र बनकर रह गया है!

बाकी तो सब, समय की कसौटी पर कसे जाने हैं लेकिन इतना परिलक्षित होने लग गया है कि नोटबन्दी की तरह ही इलेक्टोरल बाॅण्ड योजना भी देशहित व संसदीय लोकतंत्र के हित में नहीं है ।

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