बेलगाम मंहगाई बनाम जीडीपी ग्रोथ आंकडे

लेखक: सीए सी एल  यादव



31अगस्त 2021 को जारी जीडीपी ग्रोथ आंकडो के अनुसार, वित्तीय वर्ष  2021-22 की पहली तिमाही मे जीडीपी बढ़ने की दर मे 20•1% की बढ़ोतरी दर्ज की गई हैं, जिसके लिए  देश की सरकारे, जनता , व्यापार व उधोग जगत बधाई के पात्र हैं। यदि जीडीपी मे सुधार के पूर्वानुमानो की बात करे तो शुरुआत मे आरबीआई ने 26•2% अनुमानित किया था जिसको बाद मे बदलकर 21•4% कर दिया गया था, से भी वास्तविक घोषित जीडीपी विकास दर के आकडे नीचे ही रहे। देश की अर्थव्यवस्था की बदहाली, कोरोना महामारी की दुसरी लहर के दौरान बैनकाब प्रशासनिक कुप्रबंधन व अनियोजित लाॅकडाउन के दुष्परिणाम ने जिस प्रकार भारतीय जनमानस को झकझोर कर रख दिया, अर्थव्यवस्था की चुले हिला कर रख दी, असंगठित क्षेत्र लगभग तबाह हो गया हैं के दौर मे  विकास दर को सेलिब्रेट किया जाना चाहिए? 

क्या जीडीपी के आंकडे देश के 135 करोड लोगो को मुस्कुराहट दे पायेगे? यदि इन आंकडो की तुलना 2020-21 की सम्मान अवधि से करे तो वाकई देश ने तरक्की की, लेकिन चिन्ता की बात यह हैं कि अभी भी पहली तिमाही की जीडीपी का कुल आकार 2019 की समान अवधि यानी पहली तिमाही के कुल आकार से करीब 9•4%छोटा हैं।

 इस आकार मे यदि बेतहाशा बढी हुई मंहगाई, बेरोजगारी, छोटे उधमियो व व्यापारियो के खस्ताहालात, बैको के बढते एनपीए व दिवालियेपन के मामले व श्रमिको के पलायन के प्रभाव को देखे तो वास्तविक आकार मे जो बढोतरी बताई जा रही है, कि वास्तविकता कुछ और सामने ही आयेगी । 

देश मे बेलगाम मंहगाई मे पेट्रोल डीजल व रसोईगैस का भी अहम किरदार  हैं। 15 दिन से भी कम समय मे दुसरी बार 1 सितंबर को रसोईगैस सिलेण्डर के 25 रूपये और बढ़ा दिये गये।इस प्रकार घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की लागत करीब 900 रुपये प्रति सिलेंडर हो चुकी है या यो कहे कि पिछले 8 महीने मे ही करीब 190 रूपये प्रति सिलेंडर घरेलू रसोई गैस पर बढे गये हैं।

इसी प्रकार 1-4-2020 को देश की राजधानी दिल्ली मे पेट्रोल व डीजल के भाव 69•59 रूपये व 62•29 रूपये प्रति लीटर थे जो बढकर 30-6-2021को 98•81रूपये व 89•18 रूपये प्रति लीटर हो गये । इस प्रकार यह बढोतरी क्रमश 29•22 व  26•89 रूपये प्रति लीटर अर्थात करीब 42% व 43% की भारी-भरकम बढोतरी पिछले 15 महीनो मे हुई है, जिससे देश की जनता व व्यापार उधोग बुरी तरह त्रस्त है।

जहां तक औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की बात हैं तो 2021-22 की पहली तिमाही के तीन महीने 2020-21की तुलना मे 134•4%, 29•3% व 13•6% की दर से क्रमश अप्रैल, मई व जून 2021 मे वृद्घि दर्ज की हैं लेकिन यदि 2019 के स्तर से तुलना करे तो अप्रैल 2021 मे ग्रोथ दर सिर्फ 0•08% ही हैं। मई 21 के आंकडे ग्रोथ दिखा रहे हैं लेकिन यदि अप्रैल 21 से तुलना करे तो यहा भी 8%की भारी गिरावट हैं। जबकि मई 2020 मे यह गिरावट 34•7% व जून 2020 मे 16•6% की थी।

कोरोना काल मे बेरोजगारी भी बडी समस्या बनकर उभरी हैं व खासकर शहरो मे। 2021-22 की प्रथम तिमाही मे मई के महीने मे देश मे बेरोजगारी दर सर्वाधिक 11•9%थी जबकि शहरो मे बेरोजगार  14•73% रही थी।

2021 की प्रथम तिमाही की जीडीपी का कुल आकार 32•38 लाख करोड रूपये रहा है जबकि 2019 की प्रथम तिमाही की जीडीपी का कुल आकार 35•67लाख करोड रूपये व 2020 की प्रथम तिमाही की जीडीपी का कुल आकार 26•95 लाख करोड रूपये था। इस प्रकार यदि 2019 की प्रथम तिमाही के कुल जीडीपी आकार से, 2021 की प्रथम तिमाही की जीडीपी  का कुल आकार की तुलना करे तो यह अभी भी करीब 3•30 लाख करोड रूपये छोटा हैं।

बार बार अर्थशास्त्री कह रहे है कि देश की अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण व तेजी के लिए सरकारी व निजी उपभोग के साथ ही निर्यात को बढाना होगा। जहां तक निजी उपभोग व पूंजीगत खर्च व सरकारी उपभोग की बात है तो दोनो ही कोरोना महामारी से पूर्व की स्थिति से भी काफी निचले स्तर पर है। सिर्फ एक  निर्यात है जो अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम  दे रहा है।

 यहां तक कि सरकारी डिमांड यानी जीएफसीई  मे पिछले वित्त वर्ष की तुलना मे करीब 4•80% प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है जबकि सरकार के राजस्व मे बढ़त दर्ज की गई है। 

यदि वर्तमान मूल्य पर जीवीए ( ग्राॅस वेल्यू एडेड) के घटको मे वृद्घि 2019 से तुलना की बात करे तो कृषि, खनन, निर्माण व उत्पादन, युटीलिटी सप्लाई,  फाइनेंशियल,  रीयल एस्टेट,  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन  इत्यादि मे ही ग्रोथ आ पाई है जबकि अर्थव्यवस्था व जीडीपी का बहुत बडा सेक्टर, जो रोजगार के परिपेक्ष्य मे भी बहुत महत्वपूर्ण है, व्यापार,  होटल, ट्रांसपोर्ट, पर्यटन,  ब्रॉडकास्टिंग इत्यादि मे भारी गिरावट हैं।

यदि पिछले तीन वर्षो की तुलना करे तो कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र हैं जो लगातार ग्रोथ कर रहा हैं, बाकी बहुत से सेक्टर तो अभी भी मन्दी से उभर भी नही पा रहे हैं।

क्या इन तथ्यो व आंकडो के विश्लेषण के पश्चात यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था 'वी शेप रिकवरी' कर रही हैं

अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए, क्या सरकारो को निजी व सरकारी उपभोग को नही बढाना चाहिए?

क्या नोटबन्दी व जीएसटी के बाद अनियोजित लाॅकडाउन के कारण बुरी तरह प्रभावित असंगठित सेक्टर को फिर से स्थापित करने के लिए स्पष्ट व सकारात्मक नीतियो की जरूरत है?

क्या सतत आर्थिक विकास के लिए सरकार को राजकोषीय व मौद्रिक नीतियो की समीक्षा व सुदृढ़ीकरण पर ध्यान देना चाहिए ?

क्या सुरसा के मुह की तरह बढ रही कमर तोड महगाई के सामने ये विकास दर बौनी तो साबित नही होगी व क्या युवाओ के लिए रोजगार सृजन कर पायेगी ?

क्या  कोरोना महामारी की तीसरी लहर से अर्थव्यवस्था अप्रभावित रहेगी ?

आखिर सबसे अहम, की कही जीडीपी का वास्तविक आकार सिकुड़ तो नही रहा हैं?


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