पेट्रोलियम कर ढांचा व संघीय प्रणाली !!

लेखक: सीए सी एल  यादव



पेट्रोलियम की खोज से उर्जा के नये विकल्प विकसित हुए व जिसके कारण औद्योगिकीकरण मे आमूलचूल परिवर्तन आया ।  विश्व मे तीव्र आर्थिक व औद्योगिक विकास मे पेट्रोलियम वरदान साबित हुआ। परिणामतः नये आर्थिक क्षेत्रो व नई विश्व महाशक्तियो का उद्धव हुआ।

समय के साथ पेट्रोलियम पर निर्भरता इतनी अधिक हो गई की जो वरदान था वो धीरे-2 अभिशाभ साबित होने लग गया। एक ओर जहां विश्व महाशक्तिया पेट्रोलियम पदार्थो को वर्चस्व स्थापित करने के हथियार के रूप मे काम लेने लगी, वही दुसरी ओर देश की सरकारो के लिए करो के रूप मे अनाप सनाप कमाई का सरलतम जरिया बन गया। आज यदि हमारे देश की बात करे तो बेस प्राइस से दोगुने से ज्यादा दर से कर वसुले जा रहे है। वर्त्तमान मे हालात ऐसे हो गये है कि पेट्रोलियम पर अत्यधिक निर्भरता व साथ ही सीमित विकल्पो के कारण कई देशो का भुगतान संतुलन तो गडबडा ही रहा है, साथ ही अनियंत्रित महगाई का भी बडा कारण बन रहे है। आज पेट्रोलियम मे तेजी मन्दी प्रत्यक्षतः आर्थिक गतिविधियो व जन जीवन को प्रभावित कर रही है।

पेट्रोलियम के अन्तराष्ट्रीय भाव ओपेक का संगठन प्रतिदिन तय करता है व उसी अनुसार विश्व स्तर पर लेनदेन होता है। ओपेक संगठन के निर्णय, संगठन के सदस्य देशो के साथ साथ, बहुत से अन्य कारणो से प्रभावित होते है।

हम जानते है कि जब पुरा विश्व 2008 मे आर्थिक मन्दी के दोर से गुजर रहा था उस वक्त जुलाई 2008 मे पेट्रोलियम ( कच्चे तेल) के भाव 145 युएस डाॅलर प्रति बैरल से अधिक (भारतीय बास्केट मे) के ऐतिहासिक सर्वकालिक स्तर पर रहे, उसके उपरांत 2012 मे कच्चे तेल के भावो ने तेजी पकडी अन्यथा कच्चे तेल के भाव सामान्यतः 40-60 युएस डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे है। इसका अपवाद 2020 का अप्रैल महीना रहा, जब पुरा विश्व कोरोना महामारी से जुझ रहा था, करीब-2 सभी देशो मे आर्थिक गतिविधिया अचानक पुरी तरह रूक गई थी, पेट्रोलियम की भावी मांग पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे थे, विश्व अर्थतंत्र भारी दबाब मे था, के कारण पेट्रोलियम के अन्तराष्ट्रीय बाजार भाव माइनस मे चले गये थे। लेकिन ऐसा ज्यादा समय तक नही चला व आज पुन: पेट्रोलियम के भाव 70- 75 युएस डॉलर प्रति बैरल के आसपास बने हुए है।

कोरोना महामारी एक बडी आपदा थी, इस महामारी के कारण विश्व अर्थव्यवस्था पुरी तरह तन्त्र चरमा उठी है,भयंकर आर्थिक मन्दी,महगाई व बेरोजगारी के दौर से पुरा विश्व गुजर रहा हैं, नये गरीब बन रहे है, भुखमरी बढ ज्वलंत समस्या बन कर उभर रही है वही दुसरी ओर आपदा मे अवसर भी मिल रहे हैं, नये पुजीपति बन रहें हैं, पूजीपतियो की नेटवर्थ मे बेतहासा बढोतरी हो रही हैं,नये उधोग पनप रहे हैं, पूंजीबाजार रोज ऊंचाई के नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा हैं। देश की केन्द्र सरकार व राज्य सरकारो ने भी आपदा के समय आई पेट्रोलियम के भावो मे गिरावट को अवसर मे बदलते हुए पेट्रोल-डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी को 15 रूपये तक यह कहते हुए बढा दिया कि इस बढी हुई ड्यूटी का बोझा आम उपभोक्ता पर नही डाला जायेगा बल्कि, ऑयल मार्केटिंग कम्पनियो के मुनाफे से वसुला जायेगा। जिसका परिणाम है कि आज पेट्रोल के भाव 105 रूपये प्रति लीटर को व कही कही 110 रूपये तक भी पहुंच गये है वही डीजल के भाव भी 100 रूपये प्रति लीटर के इर्द-गिर्द है व कही कही पार भी कर गये है। लेकिन संवेनहीन सरकारे सुनने को तैयार नही है, बस बहाने पर बहाने बना रही है, लेकिन एक्साइज ड्यूटी व अन्य कर कम नही करना चाह रही है।

यदि वर्तमान भावो पर पेट्रोल डीजल के बैस प्राइस की बात करे तो वो करीब 35 रूपये प्रति लीटर आता है जबकि वर्तमान मे उपभोक्ताओ को करीब 70 -75 रूपये के करीब केन्द्र-राज्य करो, डीलर कमीशन व परिवहन खर्च के रूप चुकाना पड रहा है। यानी की मूल लागत का करीब दुगुना कर ,कमिशन, मुनाफे व परिवहन के नाम पर वसुले जा रहे है, जबकि पेट्रोल व डीजल अति आवश्यक वस्तुओ की श्रेणी मे आती है। फिर उपभोक्ता का शोषण क्यो? क्या देश के पेट्रोल-डीजल का उपभोग करने वाले नागरिको को उपभोक्ता संरक्षण कानून के अधिकार नही मिलने चाहिए? 

सवाल यह भी निकल कर आ रहे है कि माना कि केन्द्र सरकार करो मे राहत नही देना चाहती है, कम से कम राज्य सरकारे तो वैट को कम कर सकती है। 

इसके लिए हमको पेट्रोल डीजल पर लगने वाले करो को समझना होगा। यदि राजस्थान के परिप्रेक्ष्य मे देखे तो राजस्थान मे वर्तमान मे पेट्रोल पर वैट 36% व डीजल पर 26% है। वैट के अलावा केन्द्र सरकार एक्साइज व कस्टम ड्युटी व सेस लगाती है । 

 जहां तक एक्साइज ड्युटी की बात है तो वो वर्त्तमान मे पेट्रोल पर कुल 32•90 रूपये व डीजल पर 31•80 रूपये प्रति लीटर केन्द्र सरकार द्वारा कर लगाई जा रही है। जिसका बाइफ्रीकेशन भी देख ही लेना चाहिए।

पेट्रोल पर वसुले जा रहे करो मे बेसिक एक्साइज ड्युटी 1•40, स्पेशल एडीशनल एक्साइज ड्यूटी 11•00,रोड व इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस18•00 व कृषि सेस 2•50 रूपये प्रति लीटर है जबकि डीजल पर बैसिक एक्साइज ड्यूटी 1•80, स्पेशल एडीशनल एक्साइज ड्यूटी 8•00, रोड व इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस 18•00 व कृषि सेस 4•00 रूपये है।

अब यदि 1फरवरी 2021 से पुर्व की स्थिति देखे तो केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल पर 32•98 रूपये व डीजल पर 31•83 रूपये प्रति लीटर विभिन्न केन्द्रीय कर वसुले जा रहे थे। इस प्रकार 2021-22 के बजट मे पेट्रोल पर 8 पैसे की व डीजल पर 3 पैसे की कर राहत आम उपभोक्ताओ को मिली।

केन्द्र सरकार एक्साइज ड्युटी के अलावा पेट्रोलियम की खरीद पर कस्टम ड्युटी भी लगाती है जो करीब 15 रूपये प्रति लीटर तक होती है।

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है,जिसको फेडरल स्ट्रक्चर के विपरीत लिया गया निर्णय ही कहा जायेगा, वो यह कि वित्त मंत्री ने पेट्रोल-डीजल पर लगाई जाने वाली बैसिक एक्साइज ड्यूटी जिसका हिस्सा  राज्यो को भी मिलता है,को 1•58रुपये व 3•03 रुपये से घटा दिया, जबकि कुल स्पेशल एडीशनल एक्साइज ड्यूटी व सेस, जिसका हिस्सा राज्यो को नही मिलता है, पेट्रोल पर पहले 30 रूपये व डीजल पर 27 रूपये था को बढाकर क्रमश: 31•50 रूपये व 30 रूपये कर दिया गया। 

इसी प्रकार पेट्रोलियम पर लगने वाली कस्टम ड्युटी मे से भी करीब 14 रूपये प्रति लीटर की राशि वो है जो राज्यो मध्य हस्तांतरित नही होती है, जिस पर सिर्फ केन्द्र सरकार अपना हक समझती है।

 यहां पाठको का प्रश्न होगा कि इससे फर्क क्या पडना है,तो मेरा सीधा सा उतर होगा कि उपभोक्ताओ को तो कोई फर्क नही पड रहा है, लेकिन राज्य सरकारो की फाइनेंशियल सेहत पर काफी विपरीत प्रभाव पड रहा है, खासकर कोरोना महामारी के दौरान, उनको मिलने वाला केन्द्रीय करो मे हिस्सा लगातार कम हो रहा है,जिसके कारण विकास व सामाजिक कल्याण की योजनाओ के लिए उपलब्ध संसाधनो मे निरन्तर कमी आ रही है, राज्यो के पास आय व राजस्व के सीमित स्रोत होते है। जिसके कारण केन्द्र पर निर्भरता बढ रही है व कल्याणकारी योजनाओ को बन्द किया जा रहा है फिर उनके बजट मे कटौती की जा रही हैं।

वित आयोग की सिफारिशो के अनुसार केन्द्र सरकार केन्द्रीय करो का 41% प्रतिशत हिस्से का राज्यो मे बटवारा करती है। वित आयोग की सिफारिशो के अनुसार एडीशनल एक्साइज डुयूटी व सेस को राज्य  सरकारो को नही बांटा जाता है। इसलिए केन्द्र सरकार ने बडी चतुराई के साथ राज्यो के हिस्से वाली बैसिक एक्साइज डूयूटी को पेट्रोल पर 1•58 रूपये व डीजल पर 3•03 रूपये घटा दिया , जिससे राज्य सरकारो को  कम हिस्सा करो के रूप मे मिले। इस बदलाव के निर्णय के पीछे के कारणो व मनसा का विश्लेषण आप पाठको पर छोडता हूं।

अब सवाल यह उठता है कि 2014 से पहले, जब कच्चे तेल के भाव औसतन 90 यूएस डॉलर से अधिक रहे व 2011 मे 113 यूएस डॉलर प्रति बैरल को पार किये जाने के बाबजूद, वर्तमान जैसे हालात क्यो नही बने? के पीछे तीन मुख्य कारण मेरी समझ के अनुसार रहे होगे -

 1 केन्द्र सरकार द्वारा लगवाने जाने वाली बैसिक एक्साइज व कस्टम ड्युटी व सेस अपेक्षाकृत कम थे, यानी कि एक्साइज ड्युटी व सेस पेट्रोल पर 9•20 रूपये व डीजल पर 3•46 रुपये प्रति लीटर यानी की वर्तमान दरो से 23•70 रूपये पट्रोल पर व 28•34 रूपये डीजल पर  कम थे, व कस्टम ड्युटी भी सिर्फ 2•5% के करीब थी।  जिसका सीधा फायदा उपभोक्ताओ को मिलता था।

इसी प्रकार  जब केन्द्रीय कर कम होते है तो राज्य करो का भार भी आनुपातिक रूप से कम ही आता है।  

महान अर्थशास्त्री चाणक्य के अनुसार "जब जनता करो को बोझ समझने लग जाये तो तय मानो की, आप शासन करने का अधिकार खो चुके हो"।

 क्या वर्तमान हालात ऐसे नही है,कि जनता करो के बोझ से दबी जा रही है? क्या सरकार का एकमात्र उद्देश्य अपना खजाना भरना है??

2 पेट्रोल, डीजल व रसोईगैस व सब्सिडी होती थी।

3 आज के मुकाबले रूपया डॉलर के मुकाबले ज्यादा मजबूत था।


अब सवाल प्रबुद्ध पाठको से :

1 क्या अप्रत्यक्ष कर संग्रह का बढना एक वेलफेयर स्टेट के लिए शुभ संकेत है?

2 क्या  केन्द्र सरकार द्वारा कर राजस्व को बढाने के लिए सेस , सरचार्ज व स्पेशल ड्यूटी बढाना देश के फेडरल स्ट्रक्चर को मजबूत व सुदृढ करता है,जबकि इसका बटवारा राज्यो के बीच नही होता है?

3 केन्द्र सरकार के पास संसाधन जुटाने के असीमित विकल्प होते है के बावजूद पेट्रोल डीजल की कर दरो मे कटौती नही करना क्या उचित है, जबकि इस आपदा के समय मे केन्द्र सरकार से करो मे राहत की बडी उम्मीद है?

4 राज्य सरकारो के पास कर राजस्व व आय के सीमित विकल्प होते है जबकि विकास , शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक कल्याण की अहम जिम्मेदारिया राज्य सरकारो की होती हैं। ऊपर से कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न आर्थिक व सामाजिक चुनौतियो के कठिन समय मे केन्द्रीय करो मे हिस्सेदारी मे कटौती करना, केन्द्रीय करो मे राज्यो को मिलने वाले हिस्से का समय से सेटलमेंट नही होना, करो के बंटवारे व भुगतान मे भेदभाव पूर्ण व्यवहार कितना उचित व राज्यो के हित मे है?

5 केन्द्र सरकार द्वारा कोरोना महामारी के समय, जब अन्तरराष्ट्रीय बाजार मे कच्चे तेल के मुल्यो व मांग मे अप्रत्याशित कमी के समय केन्द्रीय करो मे की गई करीब 15 रूपयो की भारी भरकम बढोतरी की  राशी को कम करके, इस आपदा के समय महगाई , बेरोजगारी व आर्थिक मन्दी की मार झेल रहे देश के नागरिको को राहत देनी चाहिए या नही?

6 क्या पेट्रोल-डीजल की दरो मे अप्रत्याशित बढोतरी लोगो की आमदनी व बचत को प्रभावित कर रही है व जनता गरीब बन रही है के साथ ही आर्थिक विकास व जीडीपी ग्रोथ पर विपरीत प्रभाव डाल रही है?

7  क्या महगाई , उत्पादन लागत के बढने के मुख्य कारण, पेट्रोल-डीजल की बढती कीमतो को मानना कितना सही है?

8•  यदि कच्चे तेल की बढी हुई कीमतो का भार उपभोक्ताओ को ही सहना है तो फिर जब कच्चे तेल के कम भावो, का फायदा उपभोक्ताओ से  छीन कर सरकारी खजाना भरना कितना सही था?

9 और आखिरी मे यक्ष प्रश्न कि क्या वास्तविकता मे पेट्रोल-डीजल का मूल्य निर्धारण सरकारी नियंत्रण से मुक्त है ?

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